धन्वन्तरि

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धन्वन्तरि

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धन्वन्तरि हिन्दू धर्म में एक देवता हैं। वे महान चिकित्सक हैं जिन्हें देव पद प्राप्त हुआ। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ये भगवान विष्णु के अवतार समझे जाते हैं। इनका पृथ्वी लोक में अवतरण समुद्र मंथन के समय हुआ था। शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरी[4], चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती लक्ष्मी जी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिये दीपावली के दो दिन पूर्व धनतेरस को भगवान धन्वंतरी का जन्म धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन इन्होंने आयुर्वेद का भी प्रादुर्भाव किया था।[5] इन्‍हें भगवान विष्णु का रूप कहते हैं जिनकी चार भुजायें हैं। उपर की दोंनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुये हैं। जबकि दो अन्य भुजाओं मे से एक में जलूका और औषध तथा दूसरे मे अमृत कलश लिये हुये हैं। इनका प्रिय धातु पीतल माना जाता है। इसीलिये धनतेरस को पीतल आदि के बर्तन खरीदने की परंपरा भी है।[6] इन्‍हे आयुर्वेद की चिकित्सा करनें वाले वैद्य आरोग्य का देवता कहते हैं। इन्होंने ही अमृतमय औषधियों की खोज की थी। इनके वंश में दिवोदास हुए जिन्होंने 'शल्य चिकित्सा' का विश्व का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया जिसके प्रधानाचार्य सुश्रुत बनाये गए थे।[7] सुश्रुत दिवोदास के ही शिष्य और ॠषि विश्वामित्र के पुत्र थे। उन्होंने ही सुश्रुत संहिता लिखी थी। सुश्रुत विश्व के पहले सर्जन (शल्य चिकित्सक) थे। दीपावली के अवसर पर कार्तिक त्रयोदशी-धनतेरस को भगवान धन्वंतरि की पूजा करते हैं। कहते हैं कि शंकर ने विषपान किया, धन्वंतरि ने अमृत प्रदान किया और इस प्रकार काशी कालजयी नगरी बन गयी।

अनुक्रम
1
2 महिमा
3 मंत्र
3.1 धन्वंतरी स्तोत्रम
4 सन्दर्भ


आयुर्वेद के संबंध में सुश्रुत का मत है कि ब्रह्माजी ने पहली बार एक लाख श्लोक के, आयुर्वेद का प्रकाशन किया था जिसमें एक सहस्र अध्याय थे। उनसे प्रजापति ने पढ़ा तदुपरांत उनसे अश्विनी कुमारों ने पढ़ा और उन से इन्द्र ने पढ़ा। इन्द्रदेव से धन्वंतरि ने पढ़ा और उन्हें सुन कर सुश्रुत मुनि ने आयुर्वेद की रचना की।[7] भावप्रकाश के अनुसार आत्रेय प्रमुख मुनियों ने इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर उसे अग्निवेश तथा अन्य शिष्यों को दिया।

विध्याताथर्व सर्वस्वमायुर्वेदं प्रकाशयन्।
स्वनाम्ना संहितां चक्रे लक्ष श्लोकमयीमृजुम्।।[8]
इसके उपरान्त अग्निवेश तथा अन्य शिष्यों के तन्त्रों को संकलित तथा प्रतिसंस्कृत कर चरक द्वरा 'चरक संहिता' के निर्माण का भी आख्यान है। वेद के संहिता तथा ब्राह्मण भाग में धन्वंतरि का कहीं नामोल्लेख भी नहीं है। महाभारत तथा पुराणों में विष्णु के अंश के रूप में उनका उल्लेख प्राप्त होता है। उनका प्रादुर्भाव समुद्रमंथन के बाद निर्गत कलश से अण्ड के रूप मे हुआ। समुद्र के निकलने के बाद उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि लोक में मेरा स्थान और भाग निश्चित कर दें। इस पर विष्णु ने कहा कि यज्ञ का विभाग तो देवताओं में पहले ही हो चुका है अत: यह अब संभव नहीं है। देवों के बाद आने के कारण तुम (देव) ईश्वर नहीं हो। अत: तुम्हें अगले जन्म में सिद्धियाँ प्राप्त होंगी और तुम लोक में प्रसिद्ध होगे। तुम्हें उसी शरीर से देवत्व प्राप्त होगा और द्विजातिगण तुम्हारी सभी तरह से पूजा करेंगे। तुम आयुर्वेद का अष्टांग विभाजन भी करोगे। द्वितीय द्वापर युग में तुम पुन: जन्म लोगे इसमें कोई सन्देह नहीं है।[7] इस वर के अनुसार पुत्रकाम काशिराज धन्व की तपस्या से प्रसन्न हो कर अब्ज भगवान ने उसके पुत्र के रूप में जन्म लिया और धन्वंतरि नाम धारण किया। धन्व काशी नगरी के संस्थापक काश के पुत्र थे।

वे सभी रोगों के निवराण में निष्णात थे। उन्होंने भरद्वाज से आयुर्वेद ग्रहण कर उसे अष्टांग में विभक्त कर अपने शिष्यों में बाँट दिया। धन्वंतरि की परम्परा इस प्रकार है -

काश-दीर्घतपा-धन्व-धन्वंतरि-केतुमान्-भीमरथ (भीमसेन)-दिवोदास-प्रतर्दन-वत्स-अलर्क।
यह वंश-परम्परा हरिवंश पुराण के आख्यान के अनुसार है।[9] विष्णुपुराण में यह थोड़ी भिन्न है-

काश-काशेय-राष्ट्र-दीर्घतपा-धन्वंतरि-केतुमान्-भीरथ-दिवोदास।

महिमा
वैदिक काल में जो महत्व और स्थान अश्विनी को प्राप्त था वही पौराणिक काल में धन्वंतरि को प्राप्त हुआ। जहाँ अश्विनी के हाथ में मधुकलश था वहाँ धन्वंतरि को अमृत कलश मिला, क्योंकि विष्णु संसार की रक्षा करते हैं अत: रोगों से रक्षा करने वाले धन्वंतरि को विष्णु का अंश माना गया।[7] विषविद्या के संबंध में कश्यप और तक्षक का जो संवाद महाभारत में आया है, वैसा ही धन्वंतरि और नागदेवी मनसा का ब्रह्मवैवर्त पुराण[10] में आया है। उन्हें गरुड़ का शिष्य कहा गया है -

सर्ववेदेषु निष्णातो मन्त्रतन्त्र विशारद:।
शिष्यो हि वैनतेयस्य शंकरोस्योपशिष्यक:।।[11]


मंत्र

भगवाण धन्वंतरी की साधना के लिये एक मंत्र है:

ॐ धन्वंतरये नमः॥[1]
इसके अलावा उनका एक और मंत्र भी है:

ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:
अमृतकलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्वरोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
श्री धन्वंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥[1][2][3]
ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृत कलश हस्ताय सर्व आमय
विनाशनाय त्रिलोक नाथाय श्री महाविष्णुवे नम: ||
अर्थात
परम भगवन को, जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धन्वंतरी कहते हैं, जो अमृत कलश लिये हैं, सर्वभय नाशक हैं, सररोग नाश करते हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैं; उन विष्णु स्वरूप धन्वंतरी को नमन है।
धन्वंतरी स्तोत्रम
प्रचलि धन्वंतरी स्तोत्र इस प्रकार से है।

ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥
कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम।
वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम॥[1]

निवासस्थान वनश सैन
मंत्र
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:
अमृतकलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्वरोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
श्री धन्वंतरी स्वरूप श्री श्री श्री अष्टचक्र नारायणाय नमः॥

 अस्त्र शंख, चक्र,
अमृत-कलश और औषधि
सवारी कमल
तक्षकेश्वर मंदिर में धन्वन्तरी की मूर्ति

स्रोत  https://hi.wikipedia.org/wiki/धन्वन्तरि



धन्वंतरि देवाचो वैज आनी विष्णुचो एक अवतार. हाणेंच उपरांत काशीराजाच्या रुपांत पुनरावतार घेतलो अशें मानतात. रोग बरे करपी शस्त्रक्रियेची प्रक्रिया ज्या आयुर्वेदांत सांगल्या त्या आयुर्वेदाचो मुखेल उपदेशक. काशीच्या पुर्विल्ल्या पुराणकाळांतल्या राजवंशांतलो हो आयुर्वेदाचो आचार्य आशिल्लो धन्वंतरी राजा. हरिवंश, विष्णुपुराण, अग्निपुराण, वायुपुराण, भागवत, महाभारत तशेंच आयुर्वेदाविशींच्या सुश्रुतसंहिता आदी ग्रंथांनी विष्णुच्या अंशापसून निर्माण जाल्लो धन्वंतरी हो देव काशीच्या राजवंशांत वाराणसीक मनीसरुपान अवतरलो अशें म्हळां. तेचपरी ताणेंच आयुर्वेद प्रवृत्त केलो अशेंय म्हळां. हरिवंशांत ही वंशपरंपरा अशी सांगल्या

काश
दीर्घतपा
धन्व
धन्वंतरी
केतूमान
भीमरथ
दिवोदास
कांय पुराणांनी दिवोदासाकच धन्वंतरी म्हळां. वयर उल्लेख केल्ल्या पुराणांत विस्तारान समुद्र मंथनाची कथा आयल्या. ते कथेंचे तात्पर्य अशें : अमरत्व मेळपाखातीर देव आनी दानव हाणीं मेळून क्षीरसागराचें मंथन केलें. तेन्ना तातूंत चवदा रत्नां मेळ्ळी. तातूंतलोच एक धन्वंतरी देव.

एका हातांत अमृताचो बुडकुलो घेवन हो देव प्रकट जालो. उदकांतल्यान जल्मलो देखून ताका 'अब्ज' म्हण्टात. विष्णुन वर दिलो, 'तूं मनीसजल्म काशीराजाच्या घराण्यांत घेतकच जल्मतनाच तुकां सगळ्यो सिध्दी प्राप्त जातल्यो, यज्ञांत तुकां येजमान देव समजून आहुती दितलें आनी तूं अष्टांग आयुर्वेदाचो प्रवर्तक जातलो'. हाचे सुमाराभायले प्रतिभेन वेगवेगळ्या वखदांचें सार अमृताच्या रुपांत देवाक मेळ्ळें आनी ते अमर जाले. देखुनूच ताका देवांचो वैज म्हण्टात. धन्वंतरीन चिकित्सेचें गिन्यान भास्कराकडल्यान मेळयलें आनी भास्कराचें आयुर्वेद संहितेच्या आदारान चिकित्सातत्त्वविज्ञानतेत्र नांवाचो ग्रंथ रचलो, अशी पारंपारीक म्हायती आसा.

भागवत पुराणांत विष्णुच्या चोवीस अवतारांमदीं धन्वंतरीचो आस्पाव केला. विष्णूच्या अवताराची प्रतिष्ठा मेळिल्ल्यान वैष्णव मुर्तीसंभारांत धन्वंतरीचो आस्पाव जाला. शिल्पग्रंथींत ताचे मुर्तीची लक्षणां दिल्यात. धनवंतरीच्या आयुर्वेदाचे आठ वांटे आसात ते अशे

काय (शरिरविज्ञान)
बाल (भुरग्यांचें वैजकी)
ग्रह (भूत पिशाच्च आदींपसून जाल्ल्या पिडांचें वैजकी)
ऊर्ध्वांग (शिरोभागांत आनी थंयच्या इंद्रियांनी जावपी विकारांचें वैजकी)
द्वंष्ट्रा (वीख तिचित्सा)
शल्य (शस्त्राघातांची चिकित्सा)
जरा (भलायकी वाडोवपी रसायन)
वृष (वाजीकरण)
धन्वंतरीच्या नांवार आनीक धा-बारा ग्रंथ मेळटात.

धन्वंतरी हाका हिंदू वैजक शास्त्राचो प्रवर्तक मानतात आशिल्ल्यान 1971 त ताचे जयंती निमतान धन्वंतरी फाऊंडेशनाची स्थापना जाली. अॅलोपथी, आयुर्वेद, होमियोपथी, युनानी, सैमीक उपचार आनी हेर वैजकी पंथाच्या जाणकारांमदीं सुमेळ सादप हो त्या फाऊंडेशनाचो मुखेल उद्देश आसा. ह्या फाऊंडेशनाचे वतीन 1971 वर्सा वैजका वेवसायांत विशेश अशी सेवा वा संशोधन करून वैजकी शास्त्रांत नवी भर घालपी वैजका तज्ञांक वैजकी पुरस्कार दिवपाचें आरायलें. वैजकी विशयाचेर भासाभास, परिसंवाद, परिशदो तशेंच वैजकी वेवसायिकांक आदार दिवपाचो उद्देश धन्वंतरी फाऊंडेशनान दवरलां.

Source https://gom.wikipedia.org/wiki/

धन्वंतरीलाई हिन्दू धर्ममा देवताको वैद्य मानिन्छन उनी महान चिकित्सक थिए उनलाई देव पद प्राप्त भएको थियो ।हिन्दू धर्म अनुसार उनी विष्णुको २४ अवतार मध्ये एक हुन उनी समुन्द्र मन्थनको समय अवतीर्ण भएका थिए ।



भगवान धन्वंतरी हे देवांचे वैद्य आहेत. भारतात दिवाळीचा दुसरा दिवस म्हणजे आश्विन कृष्ण त्रयोदशीला म्हणजेच धनत्रयोदशीला धन्वंतरी जयंती साजरी करतात. धन्वंतरी सागरमंथन वेळी अमृत घेऊन आले होते अशी आख्यायिका आहे. धन्वंतरी ह्यांना विष्णूचा अवतार व आयुर्वेदाचे आराध्य दैवत मानले जाते.

इंद्र जेव्हा असुरांना घेऊन सागरमंथन करत होते तेव्हा चौदा रत्न निघाले. त्यांपैकी एक म्हणजे विष्णु अवतार देव धन्व॔तरी होय. धन्वंतरी अमृत घेऊन आले होते. धन्वंतरी हा वैद्यराज असून त्याच्या हातातील कमंडलू हा अमृताने भरलेला असतो अशी कल्पना आहे. भागवत पुराण या ग्रंथात विष्णू अवतारांपैकी हा एक अवतार मानला गेला आहे. याच्या कृपेमुळे वेगवेगळ्या औषधी देवांना मिळाल्या त्यामुळे त्याला देवांचा वैद्य म्हणून ओळखले जाते.

ধন্বন্তৰি বেদ আৰু পুৰাণত আয়ুৰ্বেদৰ দেৱতা বুলি উল্লেখ আছে। এওঁক দেৱতা সকলৰ চিকিৎসক বুলি গণ্য কৰা হয়। ভগৱান বিষ্ণুৰ অন্যতম অৱতাৰ ধন্বন্তৰি দেৱতা আৰু অসুৰৰ সাগৰ মন্থনৰ ফলত কাৰ্তিক কৃষ্ণপক্ষৰ ত্ৰয়োদশী তিথিত হাতত অমৃতৰ ঘটলৈ সাগৰৰ পৰা অৱতৰণ হৈছিল। সেয়ে দেৱালীৰ দুদিন আগতে তেওঁৰ জন্মজয়ন্তী পালন কৰা হয়। এই দিনা ভাৰতৰ কিছুমান ঠাইত ধনতেৰাচ হিচাপে পালন কৰা হয়। তেওঁৰ হাতত শংখ, চক্ৰ, অমৃতৰ ঘট আৰু বনৌষধি থাকে। আয়ুৰ্বেদৰ জনক হিচাপে তেওঁক সুস্থ আৰু আৰোগ্য জীৱন লাভ কৰিবলৈ পূজা অৰ্চনা কৰে। আয়ুৰ্বেদিক মহাবিদ্যালয় সমূহত ধন্বন্তৰিক বিশেষ মৰ্যদা দিয়া হয়।

২০১৬ চনত ভাৰত চৰকাৰ আৰু আয়ুস মন্ত্ৰণালয়ে ধন্বন্তৰি জয়ন্তীক ৰাষ্ট্ৰীয় আয়ুৰ্বেদ দিৱস হিচাপে পালন কৰিবলৈ ঘোষণা কৰে।[1].

পৌৰাণিক উল্লেখ
ৰামায়ণৰ বালকাণ্ড আৰু ভাগৱত পুৰাণৰ মতে ক্ষীৰ সাগৰ মন্থনৰ ফলত ধন্বন্তৰিৰ উৎপত্তি হৈছিল। দেৱতা আৰু অসুৰৰ সাগৰ মন্থনৰ ফলত কাৰ্তিক ত্ৰয়োদশী তিথিত তেওঁৰ অভিৰ্ভাৱ হৈছিল। মন্দৰগিৰী পৰ্বতক মন্থন দণ্ড আৰু সৰ্পৰাজ বাসুকীক মন্থনজৰী হিচাপে ব্যৱহাৰ কৰা সাগৰ মন্থনত উদ্ভৱ ধন্বন্তৰিৰ হাতৰ অমৃত পাবলৈ দেৱতা অসুৰে হাহাকাৰ কৰিছিল। পিছত বিষ্ণুয়ে মোহিনী অৱতাৰ ধৰি দেৱতাক অমৃত পান কৰাত সহায় কৰিলে।

ধন্বন্তৰিক আয়ুৰ্বেদৰ জনক বুলি কোৱা হয়।[2]

স্বৰূপ
ভগৱান ধন্বন্তৰিক সংস্কৃত গ্ৰন্থ সমূহত বিষ্ণুৰ এক অৱতাৰ বুলি উল্লেখ আছে। তেওঁক এজন সুঠাম দেহৰ সুন্দৰ পুৰুষৰ ৰূপত কল্পনা কৰা হয়। তেওঁৰ হাত চাৰিখন। তেওঁৰ এখন হাতত শংখ, এখনত চক্ৰ, এখনত জোক আৰু আন এখনত সঞ্জীৱনী সুধা অৰ্থাৎ অমৃতৰ ঘট থাকে। কিছুমান স্বৰূপত তেওঁৰ ওচৰত বনৌষধি আৰু আয়ুৰ্বেদ শাস্ত্ৰ দেখুওৱা হয়।[2]

মন্দিৰ
ভাৰতৰ বিভিন্ন ঠাইত ধন্বন্তৰিৰ মন্দিৰ অৱস্থিত। দক্ষিণ ভাৰতত তেওঁৰ মন্দিৰৰ সংখ্যা ভাৰতৰ আন ঠাই সমূহতকৈ বেছি। কেৰেলা আৰু তামিলনাডুত আয়ুৰ্বেদৰ ব্যাপক চৰ্চা কৰা বাবে ইয়াত ধন্বন্তৰিৰ মন্দিৰৰ সংখ্যা বেছি। তদুপৰি আয়ুৰ্বেদিক মহাবিদ্যালয় তথা পাৰম্পৰিক ভাৰতীয় চিকিৎসা প্ৰতিষ্ঠানত ধন্বন্তৰিক পূজা কৰা হয়।

தன்வந்திரி (Dhanvantari) இந்து மதத்தில் நல்ல உடல்நலத்திற்காக வழிபடப்படும் கடவுள் வடிவங்களுள் ஒன்றாகும். விஷ்ணுவின் அவதாரமாகக் கருதப்படும் இந்த வடிவம், தசாவதாரத்திற்குள் சேர்வதில்லை. பெரும் புகழ்வாய்ந்த விஷ்ணு கோவில்களில் மட்டும் தன்வந்திரி(தனிக்கோயிலில்) காணப்படுகிறார். இந்து மத வேதங்கள் மற்றும் புராணங்கள் தன்வந்திரியை தேவர்களின் மருத்துவர் என்றும் ஆயுர் வேத மருத்துவத்தின் கடவுள் என்றும் குறிப்பிடுகிறது.

தன்வந்திரி அவதாரம்
அவதார தோற்றம்
தேவர்கள் அசுரர்களுடன் போராடி வ் வலிமை இழந்தவர்களானார்கள். அவர்களுக்கு உயிர் அச்சம் ஏற்பட்டது. எனவே படைக்கும் கடவுள் பிரம்மாவிடமும், தேவர்கள் தலைவரான இந்திரனிடமும் முறையிட்டார்கள். தேவர்களுக்கு வாழ்வளிப்பதற்காக பாற்கடல் கடையப்பட்டது. அப்போது கடலிலிருந்து தன்வந்திரி அவதாரம் செய்தார் என்று புராணங்கள் கூறுகின்றன. இவரின் திருக்கரத்தில் உள்ள கலசத்திலிருந்து வழங்கிய அமிழ்தத்தை தேவர்கள் உண்டதால் நிறைவாழ்நாளைப் பெற்றார்கள்.[1]

மருத்துவம்
தனு என்ற வார்த்தைக்கு அம்பு, உடலைத் தைத்தல் என்கிற பொருள் உண்டு. எனவே, தன்வந்திரி என்கிற வார்த்தைக்கு அறுவை சிகிச்சை முறையில் சிறந்தவர் என்றும் கொள்ளலாம். பிரமன் நான்கு வேதங்களையும் படைத்து, அதன் சாரமாகிய ஆயுர்வேதத்தையும் படைத்தான். இந்த ஆயுர்வேதம் நன்றாகத் தழைத்தோங்கி, பலரையும் அடைய வேண்டும் என்பதற்காக, முதலில் சூரியக் கடவுளுக்கு உபதேசித்தார் பிரம்மன். சூரியனும் இதை நன்றாகக் கற்று உணர்ந்து, அதை எங்கும் பரவச் செய்யும் பணியை மேற்கொண்டார்.

சூரியக் கடவுளிடம் இருந்து ஆயுர்வேதத்தைக் கற்றுத் தேர்ந்த பதினாறு மாணவர்களில் மிகவும் முக்கியமானவர் தன்வந்திரி என்று பிரம்ம வைவர்த்த புராணம் சொல்கிறது. தன்வந்திரி என்று சொல்லப்படுபவர் வானத்தில் வசித்து வருபவர். அதாவது, சூரியனே தன்வந்திரி என்றும் புராணங்களில் ஒரு குறிப்பு இருக்கிறது. தன்வ என்ற பதத்துக்கு வான்வெளி என்று பொருள். தன்வன் என்றால் வான்வெளியில் உலவுபவன் என்று பொருள் கொள்ளலாம். எனவே, இவரையேச் சூரியன் என்றும் சொல்வார்கள். சூக்த கிரந்தங்களில் தன்வந்திரி என்கிற திருநாமம் சூரியக் கடவுளையேக் குறிப்பிடுகிறது. தன்வந்திரிதான் ஆயுர்வேதத்தைப் படைத்தவர் என்று மத்ஸ்ய புராணம் கூறுகிறது. தன்வந்திரியை வைத்தியத்தின் அரசன், சிறந்த மருத்துவர் என்றும் குறிப்பிடுகிறது பத்ம புராணம். வாயு புராணம், விஷ்ணு புராணம் போன்றவையும் தன்வந்திரி அவதாரம் பற்றிச் சொல்கிறது.[2]

ధన్వంతరి అన్న పేరు భారతదేశ సంప్రదాయ రచనలు, కథలలో నాలుగు విధాలుగా వినవస్తున్నది.[1]

భాగవతంలో క్షీరసాగర మధనం సమయంలో అమృత కలశాన్ని చేబట్టుకొని అవతరించిన శ్రీమహావిష్ణువు అవతారం.
బ్రహ్మవైవర్త పురాణం ప్రకారం భాస్కరుని (సూర్యభగవానుని) వద్ద ఆయుర్వేదం నేర్చుకొన్న ధన్వంతరి. ఇతడు సూర్యుని 16 మంది శిష్యులలో ఒకడు.
కాశీరాజు దేవదాసు ధన్వంతరి (అంటే "ధన్వంతరి" అన్న బిరుదు కలిగిన కాశీరాజు "దేవదాసు") - ఇతడు శుశ్రుతునికి ఆయుర్వేదం, శస్త్ర చికిత్స నేర్పాడు. ఇతడు పురాణాలలో చెప్పబడిన ధన్వంతరి అవతారమన్న విశ్వాసం ఉంది.
విక్రమాదిత్యుని ఆస్థానంలో "నవరత్నాలు"గా ప్రసిద్ధులైన పండితప్రతిభామూర్తులలో ఒకడు. ఇతడే "ధన్వంతరి నిఘంటువు" అనే వైద్య పరిభాషిక పదకోశ గ్రంథాన్ని రచించాడని ఒక అభిప్రాయం.
ఇంతే కాకుండా పూర్వకాలంలో గొప్ప గొప్ప ఆయుర్వేద వైద్యులను "ధన్వంతరి" అనే బిరుదుతో సత్కరించేవారు. కనుక వివిధ ధన్వంతరుల కథలు చరిత్రలో కలగలుపు అయి ఉండవచ్చును.


విషయ సూచిక
1 వ్యుత్పత్తి
2 భాగవతంలో గాధ
3 కాశీరాజ దివోదాస ధన్వంతరి
4 ఆలయాలు
5 కేరళ అష్టవైద్యం
6 ధన్వంతరి మంత్రం
7 ధన్వంతరి వ్రతం
8 మూలాలు
9 బయటి లింకులు
వ్యుత్పత్తి
ధన్వన్తరి శబ్దానికి "ధనుఃశల్యం, తస్య అంతం పారం ఇయర్తి, గచ్ఛతీతి, ధన్వన్తరిః" అని వ్యుత్పత్తి (Etymology) చెప్పబడింది. మనస్సు, శరీరానికి బాధను కలిగించే శల్యములను అనగా దోషాలు, రోగాలు, శరీరంలోపల వికృతులు, అఘాతాలు, వ్రణాలు మొదలైన వాటిని నివారించే వానిగా చెప్పవచ్చును. పురాతనకాలం నుంచి భారతదేశంలో శస్త్ర చికిత్సా కుశలులైన వారికి "ధాన్వన్తరీయులు" అని వ్యవహరించడం వాడుకలో ఉంది.

భాగవతంలో గాధ
భాగవతం అష్టమ స్కంధంలో క్షీరసాగర మధనం సమయాన ముందుగా హాలాహలం ఉద్భవించింది. దానిని మహాదేవుడు హరించాడు. కామధేనువు, ఉచ్ఛైశ్రవం, ఐరావతం, పారిజాతం, అప్సరసలు అవతరించారు. తరువాత రమాదేవి అవతరించి విష్ణువు వక్షోభాగాన్ని అలంకరించింది. తరువాత ధన్వంతరి అవతరించాడు.

"అప్పుడు సాగర గర్భంనుండి ఒక పురుషుడు, పీనాయుత బాహు దండాలను, కంబుకంఠాన్ని, పద్మారుణ లోచనాలను, విశాల వక్షఃప్రదేశాన్ని, సుస్నిగ్ధ కేశజాలాన్ని, నీల గాత్ర తేజాన్ని కలిగి, పీతాంబరం కట్టి, మణికుండలాలు ధరించి, పుష్పమాలా సమలంకృతుడై, హస్తతలాన అమృత కలశాన్ని దాల్చినవాడు ఆవిర్భవించాడు. అతని విష్ణుదేవుని అంశాంశ వలన పుట్టినవాడని, యజ్ఞభాగ భోజనుడు, ఆయుర్వేదజ్ఞుడు, మహనీయుడని బ్రహ్మాదులు గ్రహించి అతనికి "ధన్వంతరి" అని పేరు పెట్టినారు."[2]

కాశీరాజ దివోదాస ధన్వంతరి
భాగవతంలోనే నవమ స్కంధంలో కాశీరాజు ధన్వంతరి గురించి పురూరవ వంశక్రమంలో ఉంది (9.17.4) - ఆ ప్రకారం పురూరవునికి క్షత్రవృద్ధుడు, అతనికి సుహోత్రుడు, సుహోత్రునకు కాశ్యుడు, అతనికి కాశి, కాశికి దీర్ఘతపుడు, దీర్ఘతపునికి ధవ్వంతరి జన్మించారు. ధన్వంతరి హరి అంశతో ప్రభవించి ఆయుర్వేద ప్రవర్తకుడయ్యాడు. విష్ణుపురాణంలో కూడా ఈ వంశక్రమం ఉంది. ధన్వంతరికి మూడవ తరంవాడు దివోదాసుడు (దివోదాస ధన్వంతరి). ధన్వంతరి ఆయుర్వేద శాస్త్రాన్ని ఎనిమిది భాగాలుగా (ఆష్టాంగాలుగా) విభజించాడట. అవి [1]

కాయ చికిత్స (Internal Medicine)
కౌమారభృత్య లేదా బాలచికిత్స (Paediatrics)
భూతవైద్యం లేదా గ్రహచికిత్స (Psychiatry)
శలాక్యతంత్ర (Otto-Rhino-Laryngology & Opthalmology)
శల్యతంత్ర (Surgery)
విషతంత్ర (Toxicology)
రసాయన తంత్ర (Geriatrics)
వశీకరణ తంత్ర(The therapy for male sterility, impotency and the promotion of virility)
ఈ (సీనియర్) ధన్వంతరి కాశీరాజు దివోదాస ధన్వంతరికి ముత్తాత అయి ఉండాలి. కాశీరాజు దివోదాస ధన్వంతరి ఆయుర్వేద గ్రంధాలు ఏవైనా, ముఖ్యంగా శల్య సలాక్య తంత్రాల గురించి, వ్రాశాడో లేదో తెలియడం లేదు. బహుశా "చికిత్స తత్వ విజ్ఞానము", "చికిత్సా దర్శనము" అనేవి ధన్వంతరి దివోదాస రచనలు, "చికిత్సా కౌముది" అనేది కాశీరాజు రచన అయి ఉండవచ్చును. శుశ్రుతుడు రచించిన "శుశ్రుత సంహితము" అనే మనకు లభించే రచన అతని గురువైన కాశీరాజు బోధనలపై ఆధారపడి ఉన్నట్లు అనిపిస్తుంది. వాటి ద్వారా ఆ కాలంలో శాస్త్రీయ విధానాలు స్పష్టంగా నెలకొన్నట్లు తెలుస్తున్నది. ప్రత్యక్ష, అనుమాన, ఉపమాన ప్రమాణాల గురించి (scientific methodology comprising observation and inductive, deductive and analogical reasoning) చెప్పబడింది. శల్య తంత్ర, శలాక్య తంత్ర అనే రెండు శస్త్ర చికిత్సా విధానాలకు కాశీరాజ దివోదాస ధన్వంతరి ఆద్యుడు అనిపిస్తున్నది. ఇతను క్రీ.పూ.3000 కాలానికి చెందినవాడని ద్వారకానాధ్ అభిప్రాయపడుతున్నాడు కాని అది నిరూపించడం కష్టంగా ఉంది.[1]

ఆలయాలు
ధన్వంతరి ఆలయాలు ప్రత్యేకంగా కనిపించడం అరుదు. వారాణసిలోని సంస్కృత విశ్వవిద్యాలయం మ్యూజియంలో ఒక ధన్వంతరి విగ్రహం ఉంది. ఢిల్లీలోని "ఆయుర్వేద, సిద్ధ పరిశోధన మండలి కేంద్రం" (Central council for Research in Aurveda and Siddha) లో ఒక పెద్ద, ఒక చిన్న ధన్వంతరి విగ్రహాలున్నాయి.

తమిళనాడు లోని శ్రీరంగం రంగనాధస్వామి ఆలయం ఆవరణలో ఒక ధన్వంతరి మందిరంలో నిత్య పూజలు జరుగుతున్నాయి. మందిరం వద్దనున్న శిలాఫలకం ప్రకారం అది 12వ శతాబ్దానికి చెందినది. అప్పటి గొప్ప ఆయుర్వేద వైద్యుడు గరుడవాహన భట్టార్ ఈ మందిరంలో మూర్తిని ప్రతిష్ఠించినట్లు తెలుస్తున్నది. ఇక్కడ తీర్ధంగా కొన్ని మూలికల రసం (కషాయం) ఇస్తారు.

కేరళలో, గురువాయూర్, త్రిస్సూర్‌లకు మధ్య 20 కి.మీ. దూరంలో "నెల్లువాయ" అనే గ్రామంలో ఒక ధన్వంతరి గుడి ఉంది. ఇది గురువాయూర్ దేవస్థానం అంత పురాతనమైనదని భావిస్తారు. తమ చికిత్సావృత్తి ప్రాంభానికి ముందు చాలా మంది ఆయుర్వేద వైద్యులు ఈ మందిరాన్ని దర్శిస్తుంటారు.

కేరళలోనే కాలికట్ పట్టణం పరిసరాలలో ఒక "ధన్వంతరి క్షేత్రం" ఉంది. ఈ మందిరం ఇప్పుడు అధికంగా జనాదరణ పొందుతున్నది. వ్యాధి నివారణకు, ఆరోగ్యానికి ఇక్కడి దేవుడిని దర్శించి ప్రార్థనలు చేస్తుంటారు.

ఆంధ్రప్రదేశ్లో తూర్పు గోదావరి జిల్లాలోని చింతలూరులో ప్రసిద్ధమైన ధన్వంతరి భగవానుని దేవాలయం ఉంది.

కేరళ అష్టవైద్యం
Main article: ధన్వంతరి - అష్టవిభాగ ఆయుర్వేదం
కేరళలో సిద్ధ, ఆయుర్వేద వైద్య విధానంలో "అష్టవైద్యం" అనే ఒక విధానం ప్రసిద్ధి చెందింది. ఇది శతాబ్దాల తరబడి అవిచ్ఛిన్నంగా, పెద్దగా మార్పులు లేకుండా సాగుతున్నది. ఇలాంటి వైద్యం చేసే కుటుంబాలు ధన్వంతరిని పూజిస్తుంటారు. తమ ఆశ్రమాలలో ధన్వంతరి ఆలయాలను, విగ్రహాలను ప్రతిష్ఠించారు. కొట్టక్కల్ పులమంటల్ గ్రామంలోను, వడక్కంచేరి వద్ద, త్రిసూర్ పెరుంగ్వా వద్ద అలాంటి ఆలయాలున్నాయి. అలయిత్తూర్, కుట్టంచేరి, తైక్కాడ్, వయస్కార, వెల్లోడ్, చిరత్తమన్‌లలో అష్టవైద్య విధానాన్ని అనుసరించే కుటుంబాలున్నాయి.

ధన్వంతరి మంత్రం
ఓం నమో భగవతే వాసుదేవాయ ధన్వంతరయే అమృతకలశ హస్తాయ సర్వామయవినాశనాయ త్రైలోక్య నాథాయ శ్రీ మహా విష్ణవే నమః

ధన్వంతరి వ్రతం
Main article: ధన త్రయోదశి
ఆయుర్వేద వైద్యులు ప్రతియేటా "ధన త్రయోదశి" (దీపావళికి రెండు రోజుల ముందు) నాడు భక్తితో జరుపుకొంటారు.



ಧನ್ವಂತರಿ (Sanskrit: धन्वंतरी; ಹಿಂದೂ ಸಂಪ್ರದಾಯದಲ್ಲಿ ವಿಷ್ಣುವಿನ ಅವತಾರ. ವೇದ ಹಾಗು ಪುರಾಣಗಳಲ್ಲಿ ದೇವತೆಗಳ ವೈದ್ಯನೆಂದು ಧನ್ವಂತರಿಯ ಉಲ್ಲೇಖವಿದೆ. ಆಯುರ್ವೇದದ ದೇವತೆ ಕೂಡ ಧನ್ವಂತರಿ. ಹಿಂದೂ ಸಂಪ್ರದಾಯದಲ್ಲಿ ಆಯುರಾರೋಗ್ಯ ಬಯಸುವವರು ಧನ್ವಂತರಿಯ ಕುರಿತು ಪ್ರಾರ್ಥನೆ ಮಾಡುವುದು ಸಾಮಾನ್ಯ.

ಪುರಾಣ, ಪ್ರತೀತಿ
ಧನ್ವಂತರಿ ಭಾರತದ ಮೊದಲ ವೈದ್ಯನೆಂಬ ಪ್ರತೀತಿ ಹಾಗು ನಂಬಿಕೆ ಇದೆ. ವೈದಿಕ ಸಂಪ್ರದಾಯದ ಪ್ರಕಾರ ಧನ್ವಂತರಿ ಆಯುರ್ವೇದದ ಹರಿಕಾರ. ಹಿಂದೂ ಸಂಪ್ರದಾಯದಲ್ಲಿ ಹಲವು ಸಸ್ಯಗಳ, ಗಿಡಮೂಲಿಕೆಗಳ ಪಾರಿಸರಿಕ ಬಳಕೆಯಿಂದ ಔಷಧ ತಯಾರಿಸಿದ ಗೌರವ ಧನ್ವಂತರಿಗೆ ಸಲ್ಲುತ್ತದೆ.

ಕ್ಷೀರೋದಮಥನೋದ್ಭೂತಂ ದಿವ್ಯ ಗಂಧಾನುಲೇಪಿತಂ ಸುಧಾಕಲಶಹಸ್ತಂ ತಂ ವಂದೇ ಧನ್ವಂತರಿಂ ಹರಿಂ

ಎಂಬ ಶ್ಲೋಕದಂತೆ ಕ್ಷೀರ ಸಮುದ್ರ ಮಥನ ಕಾಲದಲ್ಲಿ ದಿವ್ಯ ಗಂಧಾನುಲೇಪಿತನಾಗಿ ಅಮೃತ ಕಲಶ ಕೈಯಲ್ಲಿ ಹಿಡಿದು ಮಹಾವಿಷ್ಣು ಧನ್ವಂತರಿಯ ಅವತಾರ ತಾಳಿದನು ಎಂದು ಪುರಾಣಗಳಲ್ಲಿ ವರ್ಣಿತವಾಗಿದೆ.ದೇವತೆಗಳು ರಾಕ್ಷಸರೊಂದಿಗೆ ಹೋರಾಡುವ ಸಂದರ್ಭಗಳಲ್ಲಿ ಗುಣಪಡಿಸಲಾರದ ನೋವು ವ್ಯಾಧಿಗಳಿಗೆ ತುತ್ತಾಗುವುದನ್ನು ಕಂಡು ವೈದ್ಯನಾಗಿ ಚಿಕಿತ್ಸೆ ನೀಡಲು ಧನ್ವಂತರಿ ರೂಪಧಾರಿಯಾಗಿ ವಿಷ್ಣು ಅವತರಿಸಿದನೆಂದು ನಂಬಲಾಗಿದೆ ) ಧನು+ಏವ+ಅಂತಃ+ಅರಿ=ಧನ್ವಂತರಿ(ಸರ್ಜನ್), ೨)ಧನುಷಾ+ತರತೇ+ತಾರಯತೇ+ಪಾಪಾತ್=ಧನ್ವಂತರಿ(ಪಾಪ ವಿಮುಕ್ತಿ) ಎಂಬುದು ಧನ್ವಂತರಿ ಪದದ ನಿಷ್ಪತ್ತಿಯಾಗಿದೆ.

ನಮಾಮಿ ಧನ್ವಂತರಿಯಾದಿದೇವಂ ಸುರಾಸುರೈರ್ವಂದಿತ ಪಾದಪದ್ಮಂ ಲೋಕೇಜರಾಋಗ್ವಯ ಮೃತ್ಯುನಾಶಂ ದಾತಾರಮೀಶಂ ವಿವಿಧೌಷಧೀನಾಂ

ಎಂಬ ಶ್ಲೋಕದೊಂದಿಗೆ ಧನ್ವಂತರಿಯನ್ನು ನಿತ್ಯ ಪ್ರಾರ್ಥಿಸಿ ಕಾರ್ಯ ಆರಂಭಿಸಿದರೆ ದಿನವಿಡೀ ಚೈತನ್ಯಪೂರ್ಣತೆ ಉಳಿಯುತ್ತದೆ ಎನ್ನಲಾಗಿದೆ.ಧನ್ವಂತರಿ ಸುಪ್ರಭಾತ, ಧನ್ವಂತರಿ ಪ್ರಪತ್ತಿ, ಧನ್ವಂತರಿ ಸ್ಮೃತಿಗಳಲ್ಲಿ ಧನ್ವಂತರಿ ದೇವರ ವಿಶೇಷತೆಯನ್ನು ಬಣ್ಣಿಸಲಾಗಿದೆ

ഔഷധവിജ്ഞാനത്തെയും പ്രയോഗത്തെയും രണ്ടായി വിഭജിച്ച പ്രാചീന വൈദ്യപ്രതിഭയായിരുന്നു ശ്രീ ധന്വന്തരി(ദേവനാഗരി: धन्वंतरी; ഇംഗ്ലീഷ്: Dhanwantari). പ്രമാണം, പ്രത്യക്ഷം, അനുമാനം, ഉപമാനം, ആപ്‌തോപദേശം എന്നിവയെ അടിസ്ഥാനമാക്കി ആയുസിന്റെ വേദമായ ആയുർവേദത്തെ ഒരു ശാസ്‌ത്രമായി ധന്വന്തരി പരിപോഷിപ്പിച്ചു. ആയുർവേദത്തെ എട്ടുഭാഗങ്ങളായി (അഷ്‌ടാംഗങ്ങൾ) വിഭജിച്ചു. ഹൈന്ദവർ പരമാത്മാവായ സാക്ഷാൽ മഹാവിഷ്ണുവിന്റെ അവതാരമായി കണക്കാക്കുന്ന ധന്വന്തരിയെ, വേദങ്ങളും പുരാണങ്ങളും ആയൂർവേദത്തിന്റെ നാഥനായി വർണ്ണിക്കുന്നു. ഹൈന്ദവ വിശ്വാസപ്രകാരം ആയുസിന്റെയും ആരോഗ്യത്തിന്റെയും ദേവതയാണ് ധന്വന്തരി. അതിനാൽ രോഗികളും ആതുരസുശ്രൂഷകരും ഒരുപോലെ ആരാധിക്കുന്ന ഭഗവാനാണ് ധന്വന്തരി. ഇതാണ് മരുന്നും മന്ത്രവും എന്ന ചൊല്ലിന് ആധാരം. പാലാഴി മഥനവേളയിൽ ദേവന്മാർക്ക് അമരത്വം പ്രദാനം ചെയ്യുന്ന അമൃതകുംഭവുമായി ധന്വന്തരി അവതരിച്ചു എന്ന് ഭാഗവതം പറയുന്നു. പൊതുവേ ചതുർബാഹു രൂപത്തിലാണ് പൂജിക്കുന്നത്. കർക്കിടക മാസത്തിൽ ആയൂർവേദചികിത്സ ആരംഭിക്കുന്നതിനു മുൻപ് ധന്വന്തരിയുടെ അനുഗ്രഹത്തിനായി പ്രാർത്ഥിക്കുന്ന അനുഷ്ഠാനം വൈദ്യന്മാർക്ക് ഇടയിലുണ്ടായിരുന്നു. ധന്വന്തരിയെ ആരാധിച്ചാൽ രോഗങ്ങൾ അകന്ന് ആരോഗ്യവും ആയുസും സിദ്ധിക്കും എന്നാണ് ഹൈന്ദവവിശ്വാസം.

നമാമി ധന്വന്തരിമാദിദേവം സുരാസുരൈർ വ്വന്ദിതപാദപത്മം
ലോകേ ജരാരുഗ്ഭയമൃത്യുനാശം ധാതാരമീശം വിവിധൌഷധീനാം”

ഔപധേനവൻ, ഔരദ്രൻ, പൗഷ്‌കലാവതൻ, കരവീര്യൻ, ഗോപുര രക്ഷിതൻ, വൈതരണൻ, ഭോജൻ, നിമി, കങ്കായണൻ, ഗാർഗ്യൻ, ഗാലവൻ എന്നിവർ ധന്വന്തരിയുടെ ശിഷ്യരായിരുന്നു.

വിവിധതരം ശസ്‌ത്രക്രിയകളെപ്പറ്റിയും ധന്വന്തരിക്ക്‌ അറിവുണ്ടായിരുന്നു. ഒട്ടേറെ ശസ്‌ത്രക്രിയോപകരണങ്ങൾ അദ്ദേഹം ഉപയോഗിച്ചിരുന്നു എന്നും കരുതുന്നു. മൂർച്ചയുള്ള 20 തരവും അല്ലാത്ത 101 തരവും ശസ്‌ത്രക്രിയോപകരണങ്ങൾ ധന്വന്തരി ഉപയോഗിച്ചിരുന്നതായി സുശ്രുതസംഹിതയിൽ നിന്ന്‌ മനസ്സിലാക്കാം.

സ്‌കന്ദ-ഗരുഡ-മാർക്കണ്ഡേയ പുരാണങ്ങളനുസരിച്ച്‌ ത്രേതായുഗത്തിലാണ്‌ ധന്വന്തരി ജീവിച്ചിരുന്നത്‌. എന്നാൽ, വിക്രമാദിത്യസദസ്സിലെ നവരത്‌നങ്ങളിലൊരാളായിരുന്നു ധന്വന്തരിയെന്നാണ്‌ പൊതുവെ കരുതപ്പെടുന്നത്‌.

ക്രി.വ. നാലാം ശതകത്തിന്റെ അവസാനമോ അഞ്ചാം ശതകത്തിന്റെ തുടക്കത്തിലോ ജീവിച്ചിരുന്ന ദിവോദാസ ധന്വന്തരിയാണ്‌ പിൽക്കാലത്ത്‌ ധന്വന്തരിയെന്ന പേരിൽ പ്രശസ്‌തയാർജ്ജിച്ചതെന്നു കരുതുന്നു.

ധന്വന്തരി നിഘണ്ടു, ചികിത്സാദർശനം, ചികിത്സാകൗമുദി, ചികിത്സാ സാരസംഗ്രഹം, യോഗചിന്താമണി തുടങ്ങി പന്ത്രണ്ടോളം ഗ്രന്ഥങ്ങൾ ധന്വന്തരിയുടേതായി അറിയപ്പെടുന്നു.


ഉള്ളടക്കം
1 ധന്വന്തരീ സ്തുതി
1.1 ധന്വന്തരീ ഗായത്രി
2 ധന്വന്തരി ക്ഷേത്രങ്ങൾ
3 അവലംബം
4 പുറത്തേക്കുള്ള കണ്ണികൾ
ധന്വന്തരീ സ്തുതി
"ഓം നമോ ഭഗവതേ വാസുദേവായ ധന്വന്തരീമൂർത്തയെ അമൃതകലശഹസ്തായ സർവാമയവിനാശായ

ത്രൈലോക്യനാഥായ

മഹാവിഷ്ണുവേ നമഃ "

"ധന്വന്തരീ മഹം വന്ദേ

വിഷ്ണുരൂപം ജനാർദ്ദനം

യസ്യ കാരുണ്യ ഭാവേന

രോഗമുക്താ ഭവേഞ്ജനാ"

ധന്വന്തരീ ഗായത്രി
ഓം ആദിവൈദ്യായ വിദ്മഹേ

ആരോഗ്യ അനുഗ്രഹ ധീമഹീ

തന്നോ ധന്വന്തരി പ്രചോദയാത് "







ധന്വന്തരി ക്ഷേത്രങ്ങൾ
ആയുർവേദത്തിന്റെ ഈറ്റില്ലമായ മലപ്പുറം ജില്ലയിലെ കോട്ടക്കലുള്ള ധന്വന്തരീ ക്ഷേത്രം പ്രസിദ്ധമാണ്. മലപ്പുറത്തെ പുലാമന്തോളിലുള്ള ശ്രീ രുദ്ര ധന്വന്തരി ക്ഷേത്രം ഈ പ്രദേശത്തിന്റെ ആയുർവേദ പാരമ്പര്യം വിളിച്ചോതുന്നു. തമിഴ്‌നാട്ടിലെ ശ്രീരംഗം രംഗനാഥസ്വാമിക്ഷേത്രത്തിന്റെ അങ്കണത്തിൽ ധന്വന്തരീപ്രതിഷ്ഠയുണ്ട്. ഈ ക്ഷേത്രത്തിൽ പന്ത്രണ്ടാം നൂറ്റാണ്ടിൽ സ്ഥാപിച്ചതെന്നു കരുതപ്പെടുന്ന ഒരു ശിലാഫലകമുണ്ട്. അക്കാലത്തെ പ്രമുഖ ആയൂർവേദ ഭിഷഗ്വരനായ ഗരുഡവാഹനൻ ഭട്ടരാണ് ക്ഷേത്രത്തിനുള്ളിൽ ധന്വന്തരീ പ്രതിഷ്ഠ നടത്തിയതെന്ന് ഇതിൽ പ്രസ്താവിക്കുന്നു. ഇവിടെ ധന്വന്തരി മൂർത്തിയുടെ പ്രസാദമായി ഭക്തർക്ക് ഔഷധസസ്യങ്ങളാണ് നൽകാറുള്ളത്.

എറണാകുളം ജില്ലയിലെ പെരുമ്പാവൂരിനടുത്ത് തോട്ടുവാ എന്ന ഗ്രാമത്തിൽ സ്ഥിതി ചെയുന്ന പ്രസിദ്ധമായ ക്ഷേത്രമാണ് "തോട്ടുവ ശ്രീ ധന്വന്തരിമൂർത്തിക്ഷേത്രം". ആറടി ഉയരത്തിൽ കിഴക്കോട്ട് ദർശനമായാണ് ഇവിടെ പ്രതിഷ്ഠ. ചതുർബാഹുവായ ഭഗവാന്റെ കൈകളിൽ ശംഖ്, ചക്രം, അട്ട, അമൃതകുംഭം എന്നിവയാണ്. തോട്ടുവ ക്ഷേത്രത്തോട് ചേർന്ന് കിഴക്കോട്ട് ഒഴുകുന്ന തോടിന് ഔഷധശക്തി ഉള്ളതായി വിശ്വസിക്കപ്പെടുന്നു. ഈ തോട്ടിൽ കുളിച്ചു ധന്വന്തരിയെ തൊഴുന്നത് രോഗശാന്തിക്ക് ഉത്തമം എന്നാണ് വിശ്വാസം. എറണാകുളത്തെ പള്ളുരുത്തിയിലും ധന്വന്തരിക്ക് ക്ഷേത്രമുണ്ട്. ഗൗഡ സാരസ്വത ബ്രാഹ്മണരുടെ ക്ഷേത്രമാണിത്.

തൃശ്ശൂർ ജില്ലയിലെ പ്രസിദ്ധമായ നെല്ലുവായ, പെരിങ്ങാവ്, മനക്കലപ്പടി ആനയ്ക്കൽ എന്നീ ക്ഷേത്രങ്ങളിലും ധന്വന്തരിയെ ആരാധിച്ചു വരുന്നു. മാവേലിക്കരയിലേ പ്രായിക്കര ക്ഷേത്രത്തിലും ചതുർബാഹുവായ ധന്വന്തരീമൂർത്തിയെ ആരാധിക്കുന്നു[1].

കോയമ്പത്തൂരിലെ രാമനാഥപുരത്ത് ആര്യവൈദ്യഫാർമസി അങ്കണത്തിൽ ധന്വന്തരി ക്ഷേത്രമുണ്ട്. 1977 ഏപ്രിൽ 25-ന് മേടമാസത്തിലെ പുണർതം നക്ഷത്രത്തിൽ താന്ത്രികരത്നം കൽപ്പുഴ ദിവാകരൻ നമ്പൂതിരിപ്പാടിന്റെ സാന്നിധ്യത്തില് ശ്രീ കൽപ്പുഴ ഹരീശ്വരൻ നമ്പൂതിരിപ്പട് ധന്വന്തരീ ഭഗവാന്റെ പ്രതിഷ്ഠാകർമ്മം നിർവ്വഹിച്ചു. ആര്യവൈദ്യഫാർമസി നടത്തിപ്പോരുന്ന ഈ ക്ഷേത്രത്തിൽ ഉപദേവതകളായി ശിവൻ, ഗണപതി, അയ്യപ്പൻ, സുബ്രഹ്മണ്യൻ, ദുർഗ്ഗ, ഭദ്രകാളി, ഹനുമാൻ, നവഗ്രഹങ്ങൾ, നാഗദൈവങ്ങൾഎന്നിവർക്കും സന്നിധികളുണ്ട്. ഹനുമാനൊഴികെയുള്ള എല്ലാവർക്കും കേരളീയ രീതിയിലാണ് പൂജകൾ നടത്തിപ്പോരുന്നത്.

ആലപ്പുഴ ജില്ലയിലെ തണ്ണീർമുക്കത്തുള്ള "മരുത്തോർവട്ടം ധന്വന്തരിക്ഷേത്രം" പ്രശസ്തമാണ്. ഇവിടത്തെ മുക്കുടി നിവേദ്യവും താൾക്കറിയും രോഗശമനത്തിന് പ്രസിദ്ധമാണ്. മരുത്തോർവട്ടത്തും വൈക്കം മഹാദേവർ ക്ഷേത്രത്തിലും ഒരുമിച്ചു ദർശനം നടത്തുന്നത് രോഗനാശത്തിനും ആയുസിനും ഉത്തമം ആണെന്ന് വിശ്വാസമുണ്ട്. കണ്ണൂർ ജില്ലയിലെ ചിറക്കലിലും, കോട്ടയം ജില്ലയിലെ ചങ്ങനാശേരിയിലും "ശ്രീ വാസുദേവപുരം ധന്വന്തരീ ക്ഷേത്രം" എന്ന പേരിലും[2], പത്തനംതിട്ട ജില്ലയിലെ ഇലന്തൂരിലെ പരിയാരത്തും ധന്വന്തരിയുടെ പേരിൽ ക്ഷേത്രമുണ്ട്. കോട്ടയത്തെ തിരുവഞ്ചൂരിനടുത്ത് പാറമ്പുഴക്കരയിലെ വൈകുണ്ഠപുരം ധന്വന്തരി ക്ഷേത്രം പ്രസിദ്ധമാണ്. എറണാകുളം ജില്ലയിലെ കൂത്താട്ടുകുളത്തുള്ള ശ്രീധരീയം നെല്യക്കാട്ട് ഭഗവതീ (ഔഷധേശ്വരീ) ക്ഷേത്രത്തിൽ ഉപദേവനായി ധന്വന്തരി കുടികൊള്ളുന്നു. ഈ ക്ഷേത്രത്തിലെ കർക്കിടകമാസത്തിലെ ഔഷധസേവ ധാരാളം ഭക്തർ പങ്കെടുക്കുന്ന ഒരു വഴിപാടാണ്. ആലപ്പുഴ ജില്ലയിലെ മറ്റൊരു പ്രധാന ധന്വന്തരി ക്ഷേത്രമാണ് "മണ്ണഞ്ചേരി കണക്കൂർ ശ്രീധന്വന്തരി ക്ഷേത്രം" പരശുരാമനാൽ നിർമിതമായ ഈ ക്ഷേത്രം വളരെ പ്രസിദ്ധമാണ്. സാധാരണ ധന്വന്തരിക്ഷേത്രങ്ങളിൽ ഇടംകയ്യിൽ ആണ് അമൃതകുംഭം എന്നാൽ കണക്കൂർ ശ്രീധന്വന്തരി ക്ഷേത്രത്തിലെ ധന്വന്തരി മൂർത്തിയുടെ വലംകയ്യിൽ ആണ് അമൃതകുംഭം ഇരിക്കുന്നത്. പല വൈഷ്ണവ ക്ഷേത്രങ്ങളിലും മഹാവിഷ്ണു അഥവാ ശ്രീകൃഷ്ണനെ ധന്വന്തരിയായി സങ്കൽപ്പിച്ചു പൂജകൾ നടത്താറുണ്ട്. ധന്വന്തരിയെയും ശിവനെയും ഭദ്രകാളിയേയും ഒരുപോലെ ആരാധിക്കുന്നത് രോഗശമനത്തിനും ദീർഘായുസിനും പകർച്ചവ്യാധിശാന്തിക്കും ഏറ്റവും നല്ലതാണ് എന്നാണ് ഹൈന്ദവ വിശ്വാസം. ഔഷധങ്ങൾ കഴിക്കുമ്പോൾ അവ ധന്വന്തരിയെ പ്രാർഥിച്ചു കൊണ്ട് പ്രസാദമാക്കി സേവിച്ചാൽ വേഗത്തിൽ രോഗമുക്തി നേടും എന്നും ഭക്തർ വിശ്വസിക്കുന്നു.


พระธันวันตริ เป็นเทพแห่งการแพทย์ในความเชื่อฮินดู และเป็นหนึ่งในอวตารของพระวิษณุ พระนามของพระองค์ปรากฏในปุราณะว่าเป็นเทพเจ้าแห่งอายุรเวท พระธันวันตริเกิดขึ้นมาจากเกษียรสมุทรระหว่างการกวนเกษียรสมุทรพร้อมกับน้ำอมฤต (น้ำศักดิ์สิทธิ์ที่ทำให้กลายเป็นอมตะ) โดยทั่วไปชาวฮินดูนิยมกราไหว้และบูชาเพื่อให้คุ้มครองสุขภาพและหายจากอาการเจ็บป่วยและโรคต่าง ๆ โดยเฉพาะช่วงเทศกาลธันเตรัส (Dhanteras) หรือ ธันวันตริ ตรโยทศิ (Dhanwantari Trayodashi) ซึ่งรัฐบาลอินเดียประกาศให้เฉลิมฉลองเป็น "วันอายุรเวทแห่งชาติ"[1]


Dhanvantari is the Hindu god of medicine and an avatar of Lord Mahavishnu. He is mentioned in the Puranas as the god of Ayurveda. He, during the Samudramanthan arose from the Ocean of Milk with the nectar of immortality. It is common practice in Hinduism for worshipers to pray to Dhanvantari seeking his blessings for sound health for themselves and/or others, especially on Dhanteras or Dhanwantari Trayodashi. The Indian Government has declared that Dhanwantari Trayodashii Kumara every year would be celebrated as "National Ayurveda Day".[1]


Contents
1 Textual sources
2 Iconography
3 Birthday celebration
4 Temples in India
5 See also
6 References
7 Further reading
8 External links
Textual sources
"Ramayana Balakaand"[citation needed] and Bhagavata Purana state that Dhanvantari emerged from the Ocean of Milk and appeared with the pot of amrita (elixir for immortality) during the story of the Samudra (or) Sagara Mathana whilst the ocean was being churned by the Devas and Asuras, using the Mandara mountain and the serpent Vasuki. The pot of Amrita was snatched by the Asuras, and after this event another avatar, Mohini, appears and takes the nectar back from the Asuras. It is also believed that Dhanvantari promulgated the practice of Ayurveda.[2] Of special mention here is the treatise of Dhanvantari-Nighantu, which completely elucidates Dhanvantari's medicinal plants.[3]

Iconography
According to the ancient Sanskrit work Vishnudharamottara, Dhanvantari is a handsome individual and should usually be depicted with four hands, with one of them carrying Amrita, the ambrosia. Dhanvantari is depicted as Vishnu with four hands, holding Shankha, Chakra, Jalauka (leech) and a pot containing Amrita. He is often shown with a leech in his hand rather than the scripturesres.

In ancient texts there are some shlokas devoted to origin of Lord Dhanvantari:

ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।

सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥

कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम।

वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम॥

सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥

Temples in India
Dhanvantari temple in Maharashtra:

In Konkan, There is a Dhanvantari temple at Dapoli, District Ratnagiri, Maharashtra. It belongs to Dongare family and is owned and run by Vaidya Aniruddha Dongare. Many devotees from konkan and rest of Maharashtra visit the temple and offer their prayers.

There are a few dedicated temples to Dhanvantari in South India especially in Kerala and Tamil Nadu, where ayurveda is highly practised and patronised. The Thottuva Dhanwanthari temple in Kerala is a particularly famous temple, where Lord Dhanvantari's idol is almost six feet tall and facing east. On the right hand the lord holds Amrith and with the left hand the lord holds Atta, Shanku and Chakra. The 'Ekadasi' day celebration, which falls on the same day as the 'Guruvayur Ekadasi' is of special significance.

In Tamil Nadu, in the courtyard of Sri Ranganathaswamy Temple (Srirangam), there is a Dhanvantari shrine where daily worship of the deity is performed. In front of this temple there is an engraved stone believed to be from the 12th century. According to the writings on the stone, Garuda Vahana Bhattar, a great ayurvedic physician, established the statue inside the temple. A prasada or theertham, a herbal decoction, is given to the visitors. The shrine is the oldest Dhanvantari shrine in the state.[4] Another Dhanvantari shrine is found in the second precinct of Varadaraja Perumal Temple in Kanchipuram.[5]

Dhanvanthari temples in Kerala, Tamil Nadu and Puducherry include:

Nelluvai Dhanwantari Temple, Wadakkanchery, Thrissur, Kerala
Sri Danvantri Arogya Peedam, Walajapet, Vellore District, Tamilnadu[6]
Thevalakkadu Sree Dhanwanthari Temple, Kulasekharamangalam Post, Vaikom, Kottayam, Kerala[7]
Aanakkal Dhanwanthari Temple, Thaniyathukunnu, Thrissur[8]
Sree Dhanwanthari Temple, Ramanathapuram, Coimbatore, Tamil Nadu[9]
Sree Dhanwanthari Temple, Maruthorvattom, Cherthala, Kerala[10]
Sree Dhanwanthari Temple, Prayikara, Mavelikara, Alleppey, Kerala[11]
Sree Dhanwanthari Temple Elanthoor, Pathanamthitta, Kerala
Sri Dhanvantri Swamy Sannidhi within the Sanjeevi Vinayakar Temple, JIPMER campus
Shri Aalkkalmanna Dhanwanthari Temple is situated at Eranthod Village, Angadippuram Panchayat, Perintalmanna Taluk of Malappuram District.
There is also Sri Murrari Dhanvantri Moorthi Kshetram temple in kollam district(boothakulam) paravur.It belongs to a family called Thundvilla, it is owned and run by the family members itself .People offer prayer for there beloved ones and offer paalpayasam to god .
Shri Dhanvantari Temple, Palluruthy, Kochi, Kerala is a small temple managed by Gowda Saraswath Brahmin Community.
In Varanaseya Sanskrit Vishwavidyalaya, Varanasi, Uttar Pradesh state, one statue of Dhanvantari is present in the University museum. Two statues are at the headquarters of the Central Council for Research in Ayurveda and Siddha at New Delhi. There is another statue inside the Ayurveda Maha Sammelan office, Dhanawantari Bhawan at New Delhi and one statue of Dhanvantari is present at Mohyal Ashram in Haridwar.

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